नाखून क्यों बढ़ते हैं? | Class 10 Hindi Chapter 4 | Class 10 Hindi

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Nakhun Kyu Badhate Hai Question Answer Class 10 Hindi

नाखून क्यों बढ़ते हैं? | Class 10 Hindi Chapter 4 | Class 10 Hindi

प्रश्न 1. मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है ?
उत्तर:- मनुष्य लगातार सभ्य होने का प्रयास करता रहा है। प्रारम्भिक काल में मनुष्य और पशु एक ही थे। नाखून हथियार थे। लेकिन जैसे-जैसे मानव विकास की धारा आगे बढ़ी, मनुष्य जानवरों से अलग होता गया। उनके हथियारों, खान-पान, सभ्यता और संस्कृति में निरंतर नवाचार होता रहा। उन्होंने जीवन के पुराने तरीके को बदल दिया। कीलें, जो हथियार थीं, अब सुंदरता का रूप देने लगी हैं। मनुष्य अपने नाखूनों को काटता है ताकि उसमें नयापन आए, वह जानवर से अलग दिखे।

प्रश्न 2. नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ ?
उत्तर:- नाखून क्यों बढ़ते हैं? एक दिन लेखक की छोटी लड़की ने उससे यह प्रश्न पूछा। उसी दिन से यह प्रश्न लेखक के चिंतन का विषय बन गया।

प्रश्न 2. बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है ?
उत्तर:- प्राचीन काल में मनुष्य जंगली था। वह एक संतरे की तरह था। उस समय वह अपने नाखूनों के सहारे किसी की जान बचाता था। दांत होने के बावजूद नाखून ही उनका असली हथियार था। उन दिनों अपने प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिए नाखून ही एकमात्र आवश्यक हिस्सा थे। समय के साथ, मानव हथियार ने एक आधुनिक रूप धारण किया और बंदूक, कारतूस, तोपों और बमों के रूप में एक आदमी की रक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। 

अत्याधुनिक हथियारों के भरोसे नखधर आदमी आगे बढ़ा है। लेकिन उसके नाखून अभी भी बढ़ रहे हैं। बढ़ते हुए नाखूनों के साथ प्रकृति मनुष्य को याद दिलाती है कि आप अभी भी अपने भीतर के हथियार से वंचित नहीं हैं। आपके नाखूनों को भुलाया नहीं जा सकता। आप वही जीवित प्राणी हैं जो सबसे पुराने नाखूनों और दांतों पर निर्भर करता है। आपके पास अभी भी एक जानवर की समानता है।

Bihar Board Class 10 Hindi Solutions गद्य Chapter 4 नाखून क्यों बढ़ते हैं

प्रश्न 3. लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप देखना कहाँ तक संगत है ?
उत्तर:- कुछ लाख साल पहले जब मनुष्य जंगल में था, उसे कीलों की जरूरत थी। संतरे की तरह कील भी मनुष्य के लिए एक हथियार थी क्योंकि आत्मरक्षा और भोजन के लिए कीलों का महत्व अधिक था। उन दिनों, प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिए नाखून एक अनिवार्य हिस्सा थे। वास्तव में, वे उसके हथियार थे। 

आज के बदलते परिवेश में, बदलते समय में, आधुनिकता के इस युग में सभ्यता के विकास के साथ-साथ इसकी आवश्यकता को एक हथियार के रूप में नहीं समझा जा रहा है।अब इंसान जानवर की तरह न रहकर आगे बढ़ गया है, इसलिए उसने भी समय के अनुसार अपने हथियार बदल लिए हैं। तार्किक रूप से प्राचीन काल के लिए एक हथियार कहा जाना उचित है। लेकिन आज इसका उपयोग मानव हथियार के रूप में नहीं किया जाता है।

प्रश्न 4. मनुष्यं बार बार नाखूनों को क्यों काटता है ?
उत्तर:- मनुष्य लगातार सभ्य होने का प्रयास करता रहा है। प्रारम्भिक काल में मनुष्य और पशु एक ही थे। नाखून हथियार थे। लेकिन जैसे-जैसे मानव विकास की धारा आगे बढ़ी, मनुष्य जानवरों से अलग होता गया। उनके हथियारों, खान-पान, रहन-सहन, सभ्यता और संस्कृति में निरंतर नवाचार होता रहा। उन्होंने जीवन के पुराने तरीके को बदल दिया। कीलें, जो हथियार थीं, अब सुंदरता का रूप देने लगी हैं। मनुष्य उनमें नवीनता लाने, उन्हें संवारने और उन्हें पशु से भिन्न दिखाने के लिए कीलों को काटता है। अब वह सबसे बुजुर्ग पशु आदमी को भूलना चाहता है। अपने नाखूनों को खूबसूरत दिखाना चाहते हैं।

प्रश्न 5. सुकुमार विनोदों के लिए नाखून को उपयोग में लाना मनुष्य ने कैसे शुरू किया? लेखक ने इस संबंध में क्या बताया है ?
उत्तर:- लेखक ने कहा है कि पशु जैसे मनुष्य भी धीरे-धीरे विकसित हुए और सभ्य हुए, फिर पशुता की पहचान बनाए रखते हुए कील काटने की प्रवृत्ति फली-फूली। यह प्रवृत्ति एक कलात्मक रूप लेने लगी। वात्स्यायन के कामसूत्र से पता चलता है कि आज से दो हजार साल पहले भारतीयों में नाखूनों को मजबूती से संवारने की प्रथा विकसित हुई थी। 

इसे काटने की कला काफी मनोरंजक बताई जाती है। त्रिकोण, वृत्ताकार, चंद्रमा के आकार, दांत आदि विभिन्न आकृतियों के नाखून उन दिनों विलासी नागरिकों के मनोरंजन का साधन बन गए थे। किसी को अपनी रुचि के अनुसार कलात्मक तरीके से कील काटना अच्छा लगता है तो कोई उन्हें उगाना पसंद करता है। लेकिन लेखक ने बताया है कि यह भूलने की बात नहीं है कि भारतवर्ष ने ऐसे तमाम अधोमुखी रुझान और चीजें बनाई हैं जो उन्हें नीचे खींचती हैं।

प्रश्न 6. नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं ? इनका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:- मानव शरीर में कई सहज वृत्ति निहित हैं। मानव शरीर में दीर्घकालीन आवश्यकता के रूप में जो सहज वृत्ति मौजूद रही है, वे ऐसे गुण हैं जो अनजाने में और अनजाने में अपने आप काम करते हैं। नाखून विकास उनमें से एक है। वास्तव में, सहज वृत्ति को अज्ञात स्मृतियाँ कहा जाता है। नाखून उगाने की सहज प्रवृत्ति मनुष्य में निहित पशुता का प्रमाण है। उन्हें काटने की प्रवृत्ति मानवता की निशानी है। मनुष्य में पशुता है लेकिन वह उसे बढ़ाना नहीं चाहता। मनुष्य ने पशुता छोड़ दी है क्योंकि वह पशु बनकर आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए पशुता की पहचान यह है कि कील मनुष्य द्वारा काटी जाती है।

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प्रश्न 7. लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर ? स्पष्ट करें।
उत्तर:- लेखक के हृदय में संघर्ष की भावना उत्पन्न हो रही है कि मनुष्य इस समय पशुता की ओर बढ़ रहा है या मानवता की ओर। वह इस प्रश्न का समाधान नहीं कर पा रहा है। इसलिए इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए इसे एक प्रश्न के रूप में लोगों के सामने स्पष्ट रूप से रखता है। मनुष्य पशुता की ओर बढ़ रहा है या मानवता की ओर। इस वैचारिक प्रश्न पर एक अध्ययन से पता चलता है कि मनुष्य पशुता की ओर बढ़ रहा है। बन्दूक, पिस्टल, बम और महाविनाश के नए हथियार रखने की मनुष्य की बढ़ती प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से पशुता का संकेत है। ऐसे हथियारों की दौड़ में पशु प्रवृत्ति वाले ही आगे बढ़ते हैं।

प्रश्न 8. देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या हैं ?
उत्तर:- लेखक देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयुक्त 'स्वतंत्रता' शब्दों का अर्थ बताता है। स्वाधीनता का अर्थ है किसी की अधीनता या अधीनता का अभाव, लेकिन 'स्वतंत्रता' शब्द का अर्थ है स्वयं के अधीन होना। अंग्रेजी में कहने को हम 'आत्मनिर्भरता' कह सकते हैं। लेखक ने निष्कर्ष निकाला है कि 'स्व' निर्धारित आत्म-बंधन का परिणाम है, जो इसे पूर्णता की ओर ले जाता है। मनुष्य की प्राप्ति प्रेम में, त्याग में, स्वयं को सबका कल्याण करने में है।

प्रश्न 9. लेखक ने किस प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती ? लेखक का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर:- प्रसंग - मैं नहीं मानता कि जो कुछ हमारा पुराना है, जो हमारे लिए खास है, हमें उस पर टिके रहना चाहिए। पुराने के साथ 'मोह' हर समय वांछनीय नहीं है। मेरे बच्चे को गोद में लिए हुए 'बंदरिया' आदमी का आदर्श नहीं बन सकता। लेखक का अर्थ है कि सभी पुराने अच्छे नहीं हैं, और सभी नए बुरे नहीं हैं। भले ही लोग दोनों की जाँच करते हैं, वे स्वीकार करते हैं कि क्या फायदेमंद है।

प्रश्न 10.‘स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है ?
उत्तर:- स्वाधीनता शब्द का अर्थ है स्वयं के अधीन होना। जिसमें 'स्व' का बंधन अवश्य होता है। क्या यह संयोग है या हमारी पूरी परंपरा अनजाने में हमारी भाषा के माध्यम से प्रकट हुई है? सभी वर्णों और सभी जातियों का एक समान आदर्श भी है।

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प्रश्न 11. निबंध में लेखक ने किस बूढ़े का जिक्र किया है ? लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है ?
उत्तर:- लेखक ने एक ऐसे वृद्ध का उल्लेख किया है, जो अपने पूरे जीवन के अनुभव को चंद शब्दों में व्यक्त कर मनुष्य को सचेत कर देता है। जो इस प्रकार है। बाहर नहीं भीतर की ओर देखें। मन से हिंसा को दूर करो, असत्य को दूर करो, क्रोध और घृणा को दूर करो, प्रजा के हित के लिए कष्ट सहो, सुख की बात मत सोचो, प्रेम के बारे में सोचो, आत्मसंतुष्टि के बारे में सोचो, काम के बारे में सोचो। लेखक की दृष्टि से कथन पूर्णतः अर्थपूर्ण हैं।

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प्रश्न 12. मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे। प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है ?
उत्तर:- ज्योतिषियों का अनुमान है कि एक दिन मनुष्य की पूंछ की तरह उसके नाखून भी गिर जाएंगे। इसी के आधार पर लेखक के मन में यह आशा उठती है कि भविष्य में मनुष्य के नाखूनों की वृद्धि रुक जाएगी और मनुष्य का अनिवार्य अंग उसी प्रकार गिरेगा। जैसे उसकी पूंछ गिर गई है, अर्थात् मनुष्य पशुता को पूरी तरह से त्याग कर पूरी तरह से मानवता को प्राप्त कर लेगा।

प्रश्न 13.‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है ?
उत्तर:- सफलता और पूर्ति में अंतर है। मनुष्य को वह वस्तु भी हथियारों के संचय से बाह्य साधनों की प्रचुरता से प्राप्त हो सकती है, जिसे उसने बड़ी धूमधाम से सफलता का नाम दिया है। लेकिन मनुष्य का अर्थ प्रेम में, मित्रता में, सबके कल्याण के लिए बिना शर्त अपने आप को देने में है। नाखूनों का काटना उस 'स्व-निर्धारित आत्म-बंधन' का परिणाम है जो उसे पूर्णता की ओर ले जाता है।

प्रश्न 14. काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर। व्याख्या करें –
उत्तर:- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक से ली गई हैं जिसका शीर्षक है कि नाखून क्यों बढ़ते हैं। इसका प्रसंग है- लेखक की पुत्री जब नाखून बढ़ने का प्रश्न पूछती है तो लेखक उस पर विचार करने लगता है। लेखक की सोच से उभरे इस छोटे से प्रश्न के बीच में यह पंक्ति भी मौजूद है। 

लेखक का मानना ​​है कि नाखून भी अपराधी की तरह ही बढ़ते हैं, बेशर्मी से सजा स्वीकार करते हुए चुप रहते हैं लेकिन फिर से अपनी आदत या लत लगाने लगते हैं और अपराध, चोरी करना शुरू कर देते हैं। यह कील भी ठीक वही अपराधी है। यह धीरे-धीरे बढ़ता है। 

काटने पर यह फिर से छत्ते की तरह उग आता है। इसमें जरा भी शर्म नहीं है। अपराधी का स्वभाव और प्रवृत्ति समान होती है। लेखक ने मनुष्य के पशुवत स्वभाव की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। वह बार-बार सुधरने और अच्छे कर्म करने की कसम खाता है। वादा करता है लेकिन कुछ देर बाद फिर वही कर्म खुद को दोहराने लगता है। कहने का मूल अर्थ यह है कि वह अपनी ऊर्जा और बुद्धि को निर्णय लेने में लगाते हुए विनाशकारी प्रकृति की ओर जाता है।

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प्रश्न 15.  मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ। व्याख्या करें –
उत्तर:- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'नाखून क्यों उगती हैं' से ली गई हैं। इन पंक्तियों का प्रसंग मनुष्य की बर्बरता से जुड़ा है। अपने निबंध में लेखक यह बताना चाहता है कि मनुष्य के नाखून उसकी उग्रता के प्रतीक हैं। कभी-कभी लेखक के मन में कील ठोकता देख निराशा उत्पन्न हो जाती है। 

वह इसके बारे में गंभीरता से सोचने लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य की बर्बरता कितनी भयानक है कि वह स्वयं अपने विनाश में लिप्त है, जिसका उदाहरण हिरोशिमा पर बमबारी है। इससे कितना पैसा और लोगों का नुकसान हुआ, संस्कृति नष्ट हुई, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 

उसकी याद आज भी दिल को सताती है। तो यह मनुष्य का पशु स्वभाव है। यह रूप उसे उसके नाखूनों की याद दिलाता है। उनकी भयावहता, बर्बरता, क्रूरता, अदूरदर्शिता और अमानवीयता, जिससे लेखक निराश हो जाता है। वह चिंतित हो जाता है। 

लेखक की दृष्टि में मनुष्य के नाखून भीषण पशुवत प्रवृत्ति के जीवंत उदाहरण हैं। मनुष्य की पशुता को कितनी बार काटने की कोशिश की जाए, फिर भी वह मरना नहीं चाहता। यह कोई नया रूप धारण करके अपना विनाशकारी रूप दिखाता है।

प्रश्न 16. कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा। व्याख्या करें –
उत्तर:- निम्नलिखित पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के पाठ 'नाखून क्यों उगती हैं' से ली गई हैं। इन पंक्तियों का सन्दर्भ संलग्न है- लेख के अंत में द्विवेदीजी बताना चाहते हैं कि यह कमबख्त कील अगर बढ़ेगी तो बढ़ेगी, लेकिन मनुष्य इसे बढ़ने नहीं देगा। लेखक के कहने का अर्थ यह है कि मनुष्य अब सभ्य और संवेदनशील हो गया है और बुद्धिजीवी हो गया है। उन्होंने नरसंहार का भीषण रूप देखा है। 

उसे याद करते हुए, वह पुलिस के पास जाता है। वह अपने विनाशकारी रूप का लाभार्थी है। हिरोशिमा का महाविनाश उसके सामने प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसलिए, वह हमेशा होशपूर्वक उससे छुटकारा पाने के लिए कदम उठा रहा है। वह अपने विनाशकारी रूप को छोड़कर रचनात्मकता की ओर बढ़ना चाहता है। 

वह मानवता की स्थापना और मानवीय मूल्यों की रक्षा में लगे रहना चाहता है। वह बेकार और विनाशकारी तत्वों से बने होकर शांति की छाया में रहना चाहता है। मनुष्य की इस तर्कसंगत सोच और दूरदर्शिता की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए लेखक यह बताना चाहता है कि अगर कमबख्त नाखून बढ़ते हैं, तो इसके बारे में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। अब मनुष्य सतर्क और सतर्क है। वह उसे बढ़ने नहीं देगा और उसे काट कर नष्ट कर देगा। कहने का अर्थ यह है कि वह क्रूरतम विनाशकारी रूप को त्याग देगा।


प्रश्न 17. लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:- लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता स्वयं द्वारा लगाया गया बंधन है। भारतीय मन आज अधीनता की दृष्टि से सोचने के बजाय स्वतंत्रता के बारे में सोचता है। यह भारतीय संस्कृति की विशेषता का परिणाम है। यह गुण हमारे लंबे समय से चले आ रहे संस्कारों से आया है, इसलिए आत्मा के बंधन को आसानी से मुक्त नहीं किया जा सकता है।

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प्रश्न 18. मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ। स्पष्ट . कीजिए।
उत्तर:- वर्तमान पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी साहित्य के ललित निबंध 'नेल क्यूं बढ़ते हैं' से उद्धृत है। इस अंश में प्रख्यात निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बार-बार काटे जाने के बाद भी उगने वाले कीलों के बहाने सभ्यता और संस्कृति की विकास गाथा को बहुत ही सरल शैली में प्रकट किया है। इसके साथ ही नाखून उसकी उग्र पशु प्रवृत्ति के बढ़ने के एक जीवित प्रतीक का भी वर्णन करते हैं। 

वर्तमान व्याख्यात्मक भाग पूरी तरह से आलंकारिक दृष्टिकोण पर आधारित है। निबंध का यह भाग आलंकारिक धारा में ही प्रवाहित हो रहा है। लेखक अपनी बात सार्वजनिक करते हैं। मनुष्य को अब नाखून नहीं चाहिए। उसके भीतर प्राचीन बर्बरता का यह हिस्सा है जिसे मनुष्य समाप्त करना चाहता है। लेकिन अगर नाखून काटना मानवीय प्रवृत्ति है और नाखून उगाना मानवीय प्रवृत्ति है, तो मनुष्य अभी भी पशु प्रवृत्ति को अपना रहा है। 

लेखक सोचता है कभी-कभी वे निराश हो जाते हैं कि इस विकासवादी युग में भी मनुष्य की बर्बरता कम नहीं हुई है। वह बढ़ती रहती है। हिरोशिमा जैसा नरसंहार पाशविक बल का सबसे बड़ा उदाहरण है। साथ ही लेखक की उदासीनता इस बात पर है कि जितनी बार मनुष्य की पशुता काटी जाती है, वह नहीं जानता कि कैसे मरना है।

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